Futures & Options Expiry Date के बारे में
शेयर बाजार की दुनिया में फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) एक ऐसी रेस है जिसकी एक फिनिश लाइन होती है। इस फिनिश लाइन को ही हम "एक्सपायरी (Expiry)" कहते हैं। अगर आप बिना एक्सपायरी को समझे ट्रेडिंग कर रहे हैं, तो आप बिना ब्रेक की गाड़ी चला रहे हैं।
चाहे आप निफ्टी (Nifty) में ट्रेड करें या बैंक निफ्टी (Bank Nifty) में, एक्सपायरी के दिन मार्केट की उठापटक (Volatility) चरम पर होती है। चलिए, आज इस विषय की गहराई में उतरते हैं और समझते हैं कि एक्सपायरी का असली सच क्या है।
महीने का वह दिन जिस दिन फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस के सौदे समाप्त होते हैं। उसे एक्सपायरी डेट कहते हैं। अब F&O की साप्ताहिक एक्सपायरी को समाप्त कर दिया गया है। अब केवल निफ्टी की साप्ताहिक एक्सपायरी होती है। जिस भी ऑप्शंस ट्रेडर्स के पास ये कॉन्ट्रेक्ट होते हैं। यदि वह उन्हें एक्सपायरी के बाद भी बनाये रखता है तो एक्सपायरी डेट निकलने के बाद वे कॉन्ट्रेक्ट बेकार हो जाते हैं।
इस आर्टिकल में आप एक्सपायरी के उस "गुप्त गणित" को समझेंगे जिसे जानकर आप नुकसान से बचेंगे और एक प्रोफेशनल ट्रेडर की तरह प्रॉफिट कमाना शुरू करेंगे। डेरिवेटिव मार्केट का आज, शेयर मार्केट निवेश में बड़ा हिस्सा है। F&O मार्केट में ट्रेड किये जाने वाले स्टॉक्स डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट होते हैं।
ये भी जानें- एक्सपायरी से पहले मुनाफा कमाने का असली मंत्र।
डेरिवेटिव एक कॉन्ट्रेक्ट है, जिसमें अंडरलाइंग एसेट को भविष्य की एक निश्चित तारीख और प्राइस पर खरीदा और बेचा जाता है। दूसरी तरफ ऑप्शन कॉन्ट्रेक्ट में एक ट्रेडर को अंडरलाइंग एसेट को खरीदने और बेचने का अधिकार तो होता है। लेकिन ऑप्शन ट्रेडर ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है। लेकिन फ्यूचर्स में ट्रेडिंग करते समय ट्रेडर्स निर्दिष्ट तारीख पर अपनी पोजीशन को एक्सरसाइज करने के लिए बाध्य होता है। लेकिन ऑप्शन ट्रेडिंग में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।
Expiry Date क्या होती है?
शेयर मार्केट में एक्सपायरी डेट उन कॉन्ट्रैक्ट्स से जुडी होती है, जो डेरिवेटिव मार्केट (Futures & Options) से जुड़े होते हैं। सरल शब्दों में एक्सपायरी डेट वह होती है, जिस दिन ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट एक्सपायर होते हैं। प्रत्येक फ्यूचर एंड ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट किसी अंडरलेइंग एसेट को खरीदने और बेचने के कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित होते हैं।
अंडरलाइंग एसेट में स्टॉक, कमोडिटी और करेंसी आदि हो सकती हैं। जिस कॉन्ट्रैक्ट में निवेशक शामिल होते हैं या सहमत होते हैं। उनकी एक्सपायरी डेट फिक्स होती है, जिसे एक्सपायरी डेट कहते हैं। जिसके पहले अंडरलाइंग एसेट ट्रेड में प्रॉफिट-लॉस को बुक करने के लिए खरीदी या बेचीं जाती है या कॉन्ट्रैक्ट को समाप्त होने दिया जाता है।
- डेरिवेटिव के लिए एक्सपायरी डेट अंतिम तिथि है, जिस तक कॉन्ट्रैक्ट वैध होते हैं। उसके बाद F&O कॉन्ट्रेक्ट एक्सपायर हो जाते हैं। इंडिया में Futures & Options की साप्तहिक एक्सपायरी को समाप्त कर दिया गया है।
- अब केवल निफ़्टी और सेंसेक्स की ही साप्ताहिक एक्सपायरी होती है। निफ़्टी की साप्ताहिक एक्सपायरी प्रत्येक बृहस्पतिवार को होती है और सेंसेक्स की साप्ताहिक एक्सपायरी प्रत्येक मंगलवार को होती है।
- F&O में NSE स्टॉक एक्सचेंज के सभी इंडेक्सों की मंथली एक्सपायरी महीने के आखिरी बृहस्पतिवार को होती है। यदि महीने के आखिरी बृहस्पतिवार को मार्केट की छुट्टी होती है, तो एक्सपायरी पहले ही दिन हो जाती है। बुल ट्रैप और बेयर ट्रैप
- जबकि BSE स्टॉक एक्सचेंज के सभी इंडेक्सों की मंथली एक्सपायरी महीनें के आखिरी मंगलवार को होती है। यदि महीनें के आखिरी मंगलवार को मार्केट में अवकाश होता है तो एक्सपायरी एक दिन पहले ही हो जाती है।
- डेरिवेटिव के प्रकार के आधार पर Expiry Date के अलग-अलग परिणाम हो सकते हैं।
- ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट ओनर अपने ऑप्शन कॉट्रैक्ट का प्रयोग (exercise) कर सकते हैं। यानि अपने प्रॉफिट और लॉस को बुक कर सकते हैं या चाहें तो उसे बेकार ही एक्सपायर होने दे सकते हैं।
- फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट का मालिक को एक्सपायरी डेट तक अपने अंडरलेइंग एसेट की पोजीशन को चाहें तो बंद कर सकते हैं। या डिलीवरी भी ले सकते है। अगर फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के मालिक यदि चाहें तो अपनी पोजीशन को रोलओवर भी कर सकते हैं।
- एक बार जब एक ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट expiry हो जाता है, उसके बाद वह ऑप्शन इनवेलिड हो जाता है।
- इक्विटी ऑप्शंस में ट्रेड करने का आखिरी दिन एक्सपायरी का दिन, एक्सपायरी से पहले तक होता है। इसके लिए ऑप्शंस ट्रेडर्स को तय करना होता है कि उन्हें अपने ऑप्शंस के साथ क्या करना है।
- OTM ऑप्शन में ऑटोमेटिक एक्सरसाइज होने का प्रावधान होता है। यदि एक्सपायरी के समय ऑप्शन आउट-ऑफ-द-मनी होता है। यदि कोई F&O trader अपने ऑप्शन का प्रयोग नहीं करना चाहता है तो उसे expiry date तक अपनी पोजीशन को बंद करना चाहिए या उसे रोलओवर करना चाहिए।
एक्सपायरी डेट और ऑप्शन वैल्यू
- प्रीमियम जीरो होना (Zero-Hero): अगर कोई ऑप्शन "Out of the Money" (OTM) है, तो एक्सपायरी के दिन उसका भाव ₹0 हो जाता है।
- टाइम डिके (Time Decay/Theta): जैसे-जैसे एक्सपायरी का समय करीब आता है, ऑप्शंस की वैल्यू बहुत तेजी से गिरने लगती है।
- वोलैटिलिटी (Volatility): बड़े संस्थान (FII/DII) अपनी पोजीशन एडजस्ट करते हैं, जिससे मार्केट में बड़े मूव्स आते हैं।
- पुट ऑप्शन
- कॉल ऑप्शन।
एक्सपायरी से प्रॉफिट कैसे कमाएं? (The Earning Angle)
- Hero or Zero Strategy: हीरो-जीरो स्ट्रेटेजी में ट्रेडर्स बहुत कम प्रीमियम (जैसे ₹5-10) वाले ऑप्शंस खरीदते हैं। अगर मार्केट में बड़ा मूव आया, तो यह ₹100 भी हो सकता है। (रिस्की लेकिन रिवॉर्डिंग)।
- Option Selling: एक्सपायरी के दिन प्रीमियम तेजी से घटता है। सेलर्स इसका फायदा उठाते हैं और प्रीमियम को अपनी जेब में डालते हैं।
- Hedging: अपनी होल्डिंग्स को बचाने के लिए पुट (Put) ऑप्शंस खरीदना।
फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स की वैल्यू
| विशेषता | फ्यूचर्स (Futures) | ऑप्शंस (Options) |
| वैल्यू | अंडरलाइंग एसेट के बराबर चलती है। | इसमें प्रीमियम होता है जो जीरो हो सकता है। |
| दायित्व | एक्सपायरी पर सेटल करना अनिवार्य है। | खरीदार के पास अधिकार है, दायित्व नहीं। |
| टाइम डिके | इसमें समय का नुकसान नहीं होता। | इसमें समय (Theta) सबसे बड़ा दुश्मन है। |
Expiry Trading के 5 सुनहरे नियम
- इन द मनी (ITM) में ट्रेड करें: अगर आप सुरक्षित रहना चाहते हैं, तो हमेशा ITM ऑप्शंस चुनें क्योंकि इनके जीरो होने के चांस कम होते हैं।
- 3:00 PM का मूव: अक्सर एक्सपायरी के दिन दोपहर 2:30 से 3:00 बजे के बीच सबसे बड़ा मूव आता है। इसे "Jackpot Move" भी कहते हैं।
- स्टॉप लॉस है जरूरी: बिना स्टॉप लॉस के एक्सपायरी ट्रेडिंग करना सुसाइड करने जैसा है।
- रोलओवर (Rollover) को समझें: अगर आप अपनी पोजीशन अगले महीने ले जाना चाहते हैं, तो समय रहते पुराने कॉन्ट्रैक्ट को बेचकर नया खरीदें।
.jpeg)
0 टिप्पणियाँ