Futures Margin: 90% ट्रेडर्स फ्यूचर्स मार्जिन ट्रेडिंग में यह गलती करते हैं?

 Futures margin: फ्यूचर्स मार्जिन वह राशि है जो ट्रेडर को एक्सचेंज या ब्रोकरेज के पास जमा करनी होती है। ताकि यह गारंटी हो कि वह कॉन्ट्रैक्ट की जिम्मेदारियों को पूरा कर सके। आइए विस्तार से जानते हैं- 90% ट्रेडर्स फ्यूचर्स मार्जिन ट्रेडिंग में यह गलती करते हैं? Futures Margin explained in Hindi. 

Futures Margin

आप शेयर बाजार में ट्रेडिंग शुरू करना चाहते हैं। आप Nifty को 22,000 पर देखते हैं और आपको पक्का यकीन है कि यह अगले कुछ दिनों में 22,500 तक जाएगा। आप Nifty का एक लॉट खरीदना चाहते हैं। Nifty के एक लॉट में 75 यूनिट होते हैं। तो, 75 यूनिट * 22,000 रुपये = 16,50,000 रुपये (सोलह लाख पचास हजार रुपये!)

आप अपनी जेब देखते हैं और पाते हैं कि आपके ट्रेडिंग अकाउंट में तो सिर्फ 2,50,000 रुपये हैं। आप निराश हो जाते हैं। क्या इसका मतलब है कि आप यह ट्रेड नहीं ले सकते? बिलकुल नहीं!

शेयर मार्केट की दुनिया में एक "जादुई" कॉन्सेप्ट है, जिसे 'फ्यूचर्स मार्जिन' (Futures Margin) कहते हैं। यह एक ऐसा टूल है जो आपको 16,50,000 रुपये का यह सौदा सिर्फ 1.5 से 2.5 लाख रुपये में करने की इजाजत देता है। जी हाँ, आपने सही पढ़ा। यह ताकत है लीवरेज (Leverage) की, और इसकी चाबी है 'फ्यूचर्स मार्जिन'।

लेकिन रुकिए... इससे पहले कि आप इसे "जल्दी अमीर बनने" की स्कीम समझ लें, एक कड़वी सच्चाई भी जान लें। जिस टूल में 1 लाख को 2 लाख बनाने की ताकत है, वही टूल आपके 1 लाख को शून्य (Zero) भी कर सकता है... और वो भी बहुत तेजी से। 

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फ्यूचर्स मार्जिन क्या है? (What is Futures Margin)

सबसे पहले, यह समझते हैं कि फ्यूचर्स मार्जिन क्या नहीं है क्योंकि बहुत बड़ी गलतफहमी है, बहुत से लोग सोचते हैं कि फ्यूचर्स मार्जिन एक 'डाउन पेमेंट' (Down Payment) है। जैसे आप कार खरीदने के लिए देते हैं और बाकी का लोन लेते हैं। यह बिलकुल गलत है। फ्यूचर्स मार्जिन कोई पेमेंट नहीं है, यह एक 'गुड फेथ डिपॉजिट' (Good Faith Deposit) या 'सिक्योरिटी डिपॉजिट' (Security Deposit) की तरह है।

इसे एक आसान उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आप एक मकान किराए पर लेना चाहते हैं, जिसका किराया 20,000 रुपये प्रति माह है। मकान मालिक आपसे 40,000 रुपये की सिक्योरिटी डिपॉजिट मांगता है। यह 40,000 रुपये मकान मालिक की जेब में नहीं जा रहे। 

यह सिर्फ एक गारंटी के तौर पर रखे गए हैं कि अगर आप मकान में कोई तोड़-फोड़ करते हैं या किराया दिए बिना भाग जाते हैं तो वह इस पैसे से अपने नुकसान की भरपाई कर सके। जब आप मकान सही-सलामत खाली करते हैं, तो यह 40,000 रुपये आपको वापस मिल जाते हैं।

फ्यूचर्स मार्जिन भी ठीक इसी तरह काम करता है। जब आप 11 लाख रुपये का Nifty फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट खरीदते (या बेचते) हैं। तब आप असल में सोलह लाख पचास हजार रुपये के शेयर नहीं खरीद रहे होते। आप बस एक वादा कर रहे होते हैं कि भविष्य की किसी तारीख (Expiry Date) पर आप उस कीमत पर सौदा करेंगे।

लेकिन ब्रोकर और स्टॉक एक्सचेंज (NSE/BSE) आपको जानते नहीं हैं। उन्हें क्या भरोसा कि अगर ट्रेड आपके खिलाफ गया और आपको 1 लाख का नुकसान हो गया, तो आप पैसे चुका देंगे? बस, इसी भरोसे को कायम करने के लिए एक्सचेंज आपसे एक 'सिक्योरिटी डिपॉजिट' लेता है, जिसे 'इनिशियल मार्जिन' (Initial Margin) कहा जाता है। 

यह आमतौर पर कॉन्ट्रैक्ट की कुल वैल्यू का 10% से 15% (या उससे भी ज्यादा) हो सकता है। यह पैसा आपके ट्रेडिंग अकाउंट में 'ब्लॉक' (Block) कर दिया जाता है। यह आपका ही पैसा है लेकिन आप इसे ट्रेड पूरा होने तक निकाल नहीं सकते।

Futures Margin की जरूरत क्यों है?

यह सिक्योरिटी डिपॉजिट है, लेकिन इसकी जरूरत क्या है? ट्रेडर्स से पूरा पैसा क्यों नहीं लिया जाता है?"
इसका जवाब एक शब्द लीवरेज (Leverage) में है। लीवरेज का मतलब है 'उत्तोलन' या 'कम पैसे से बड़ा सौदा करने की क्षमता'। फ्यूचर्स मार्जिन ही वह टूल है जो आपको लीवरेज देता है।

बिना मार्जिन वाली ट्रेडिंग की दुनिया (इक्विटी) में आपको सोलह लाख पचास हजार का Nifty 50 खरीदने के लिए पूरे 16,50,000 रुपये देने पड़ते। अगर Nifty 1% (220 पॉइंट) बढ़ता तो आपको 16,500 रुपये का फायदा होता। (16 लाख पचास हजार का रिटर्न = 1% प्रॉफिट)।

मार्जिन वाली दुनिया (फ्यूचर्स): आपने सोलह लाख पचास हजार का Nifty खरीदने के लिए सिर्फ 1.5 लाख रुपये का मार्जिन दिया। अगर Nifty 1% (220 पॉइंट) बढ़ता, तो आपको फायदा अभी भी 16,500 रुपये का ही होगा (क्योंकि फायदा-नुकसान हमेशा पूरी कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू पर होता है)।

लेकिन अब जरा अपना रिटर्न कैलकुलेट कीजिए। आपने लगाए 1.5 लाख और कमाए 16,500 रुपये। (1.5 लाख पर 16,500 रूपये का रिटर्न = लगभग 11% प्रॉफिट)। देखा आपने? मार्जिन ने आपके 1% के प्रॉफिट को 9.1% के प्रॉफिट में बदल दिया! यही लीवरेज का जादू है। लेकिन... (और यह 'लेकिन' बहुत बड़ा है)

यह जादू उल्टा भी चलता है। अगर Nifty 1% गिर जाता, तो आपको 16,500 रुपये का नुकसान होता। आपके 1.5 लाख रुपये के इन्वेस्टमेंट पर यह 11% का सीधा नुकसान है। अगर Nifty 10% गिर जाए (जो नामुमकिन नहीं है), तो आपका 1.5 लाख का पूरा मार्जिन खत्म हो जाएगा। 

लीवरेज एक दोधारी तलवार है। यह आपको रातों-रात अमीर बना सकता है और रातों-रात आपका अकाउंट भी साफ कर सकता है। Futures Margin इसी तलवार को संभालने का सिस्टम है। 

ये भी जानें- 

Futures Margin के प्रकार: यह सिर्फ एक मार्जिन नहीं है

जब हम 'मार्जिन' कहते हैं तो असल में हम निम्नलिखित तीन अलग-अलग चीजों की बात कर रहे होते हैं। इन तीनों को समझना F&O ट्रेडिंग के लिए सांस लेने जितना जरूरी है।

इनिशियल मार्जिन (Initial Margin)

इनिशियल मार्जिन ट्रेड का 'एंट्री टिकट' होता है। जैसा कि हमने ऊपर चर्चा की, यह वह न्यूनतम राशि है जो आपको कोई भी फ्यूचर्स ट्रेड (चाहे आप खरीदें या बेचें) लेने के लिए अपने अकाउंट में रखनी होती है। 
  • कौन तय करता है? स्टॉक एक्सचेंज (जैसे NSE) इसे तय करता है।
  • कैसे तय होता है? यह SPAN मार्जिन और एक्सपोजर मार्जिन को मिलाकर बनता है।
उदाहरण: 11 लाख के Nifty कॉन्ट्रैक्ट के लिए, एक्सचेंज कह सकता है कि SPAN मार्जिन 1,00,000 रुपये है और एक्सपोजर मार्जिन 20,000 रुपये है। तो आपका टोटल इनिशियल मार्जिन = 1,20,000 रुपये होगा। जब आप ट्रेड लेते हैं तो आपके ब्रोकर के टर्मिनल पर "Available Funds" में से 1.2 लाख रुपये "Blocked Margin" में चले जाते हैं।

मेंटेनेंस मार्जिन (Maintenance Margin)

मेंटेनेंस मार्जिन 'खेल में बने रहने' की फीस के लिए होता है। यही वह पेंच है, जहाँ ज्यादातर नए ट्रेडर्स फंसते हैं।
सोचिए, आपने 1.2 लाख का मार्जिन देकर Nifty खरीद लिया। अगले ही दिन Nifty 500 पॉइंट गिर गया। आपका नुकसान = 500 पॉइंट्स * 75 (लॉट साइज) = 37,500 रुपये। अब, क्या आपके अकाउंट में अभी भी 1.2 लाख का मार्जिन ब्लॉक है? नहीं।

यह 37,500 का नुकसान आपके ब्लॉक किए गए मार्जिन से काटा जाएगा। तो आपका मार्जिन बैलेंस अब बचा: 1,20,000 - 37,500 = 82,500 रुपये। एक्सचेंज को यह पसंद नहीं है। उन्हें अपने 1.2 लाख की सिक्योरिटी डिपॉजिट पूरी चाहिए। यहीं पर 'मेंटेनेंस मार्जिन' का रोल आता है।

मेंटेनेंस मार्जिन आमतौर पर इनिशियल मार्जिन का 80% या 90% होता है। हमारे उदाहरण में, मान लेते हैं मेंटेनेंस मार्जिन है 1,00,000 रुपये। एक्सचेंज का नियम है "हमें कोई दिक्कत नहीं अगर आपका मार्जिन 1.2 लाख से घटकर 1.1 लाख या 1.05 लाख हो जाए।

जिस पल यह 1,00,000 रुपये (मेंटेनेंस मार्जिन लेवल) से नीचे गया, हमें हमारी पूरी सिक्योरिटी (1.2 लाख) वापस चाहिए।" जैसे ही आपका मार्जिन ,रुपये पर पहुंचा (जो 1 लाख के मेंटेनेंस लेवल से कम है), एक अलार्म बज उठता है। इस अलार्म को कहते हैं... मार्जिन कॉल।

मार्क-टू-मार्केट (Mark-to-Market or MTM)

  1. मार्क-टू-मार्केट के द्वारा ट्रेडर की फ्यूचर्स पोजीशन का हर दिन का हिसाब होता है। 
  2. MTM वह प्रक्रिया है, जिसके कारण आपका मार्जिन बैलेंस हर दिन ऊपर-नीचे होता है।
  3. फ्यूचर्स मार्केट का एक नियम है, "हिसाब रोज का रोज।" हर ट्रेडिंग सेशन के अंत में, स्टॉक एक्सचेंज आपके ट्रेड को उस दिन की क्लोजिंग प्राइस से मिलाता है।
  4. अगर आपको फायदा हुआ, (मान लीजिए Nifty 200 पॉइंट चढ़ गया), तो 200 * 75 = 15,000 रुपये आपके मार्जिन अकाउंट में जोड़ दिए जाएंगे। आपका बैलेंस 1.2 लाख से 1.3 लाख हो जाएगा। आप चाहें तो यह 15,000 रुपये अगले दिन निकाल सकते हैं (इसे MTM प्रॉफिट कहते हैं)।
  5. अगर आपको नुकसान हुआ जैसा हमारे पिछले उदाहरण में हुआ तो 37,500 रुपये आपके मार्जिन अकाउंट से काट लिए जाएंगे।
  6. यह MTM सेटलमेंट ही वह इंजन है जो मार्जिन सिस्टम को चलाता है और यह सुनिश्चित करता है कि डिफॉल्ट का खतरा कम से कम हो। 

मार्जिन कॉल (Margin Call): ट्रेडर्स का सबसे बड़ा डर

'मार्जिन कॉल' वह खतरनाक ईमेल, SMS या नोटिफिकेशन है जो आपका Stockbroker आपको तब भेजता है। जब आपका मार्जिन बैलेंस 'मेंटेनेंस मार्जिन' से नीचे गिर जाता है। यह एक चेतावनी है। आपका स्टॉक ब्रोकर कह रहा है "दोस्त, तुम्हारा नुकसान बढ़ रहा है। हमारा सिक्योरिटी डिपॉजिट (इनिशियल मार्जिन) खतरे में है। या तो और पैसे डालो, अन्यथा हम तुम्हारा सौदा काटने पर मजबूर हो जाएंगे।

राहुल की मार्जिन कॉल स्टोरी: ट्रेड लिया, राहुल ने Nifty का 1 लॉट 22,000 पर खरीदा। इससे इनिशियल मार्जिन ₹1,20,000 (यह ब्लॉक हो गया)। मेंटेनेंस मार्जिन के लिए कम से कम 1,00,000 रूपये जरूरी (यह खतरे का लेवल है) हैं।

पहला दिन (Day 1), Nifty 500 पॉइंट गिरकर 21,500 पर बंद हुआ। इससे MTM नुकसान: 500 * 75 = ₹37,500 रूपये। राहुल का नया मार्जिन बैलेंस ₹1,20,000 - ₹37,500 = ₹82,500। यह बैलेंस ₹1,00,000 के मेंटेनेंस मार्जिन से कम है। अतः राहुल का ब्रोकर उसे मार्जिन कॉल करेगा। इससे बचने के लिए राहुल को अपने ट्रेडिंग अकाउंट में कम से कम 37,500 रूपये कमा करने होंगे। अन्यथा ब्रोकर आपका सौदा काट देगा। 

इसके लिए ब्रोकर राहुल को कॉल/SMS करेगा: "सर, आपका मार्जिन कम हो गया है। आपको ₹37,500 (95,000 को वापस 1,20,000 के इनिशियल लेवल पर लाने के लिए) कल सुबह बाजार खुलने से पहले जमा करने होंगे।"
नोट: आपको सिर्फ 17,500 रुपये (1 लाख के लेवल तक) नहीं, बल्कि पूरा 37,500 रुपये जमा करना होगा। 

ताकि आपका मार्जिन वापस इनिशियल मार्जिन (1.2 लाख) के बराबर हो जाए। मार्जिन कॉल आने पर राहुल के पास क्या विकल्प हैं? पैसे जमा करना (Add Funds): राहुल अपने बैंक अकाउंट से ट्रेडिंग अकाउंट में 37,500 रुपये ट्रांसफर कर दे। उसका मार्जिन वापस 1.2 लाख हो जाएगा और वह ट्रेड में बना रह सकता है।

सौदा काटना (Square Off Position): राहुल मान ले कि वह गलत था। वह सुबह बाजार खुलते ही अपना Nifty का लॉट 21,500 पर बेच देता है और 37,500 रुपये का नुकसान बुक कर लेता है। उसका ट्रेड खत्म, मार्जिन फ्री।

कुछ न करना (The Worst Choice): राहुल कॉल को अनदेखा कर देता है। अगर राहुल ने कुछ नहीं किया तो क्या होगा? ब्रोकर इंतजार नहीं करेगा। एक्सचेंज का नियम है। अगर राहुल पैसे जमा नहीं करता, तो ब्रोकर का 'रिस्क मैनेजमेंट' डिपार्टमेंट खुद राहुल की पोजीशन को बाजार भाव पर काट देगा (Square Off कर देगा)।

इसमें सबसे बड़ा खतरा यह है कि हो सकता है ब्रोकर के सौदा काटने तक Nifty और ज्यादा गिर जाए तो राहुल का नुकसान 37,500 रूपये से ज्यादा हो सकता है। ब्रोकर अपना पैसा वसूल लेगा और बाकी का नुकसान राहुल के अकाउंट पर डाल देगा।

SPAN और एक्सपोजर मार्जिन क्या हैं? 

पर्दे के पीछे का गणित, हमने 'इनिशियल मार्जिन' की बात की। लेकिन यह 1.5 लाख रूपये का आंकड़ा आया कहाँ से? इसे एक्सचेंज निम्नलिखित दो कंपोनेंट्स का उपयोग करके तय करता है-

1. SPAN मार्जिन (SPAN Margin)

SPAN का मतलब है Standard Portfolio Analysis of Risk (रिस्क का स्टैंडर्ड पोर्टफोलियो एनालिसिस)। यह एक बहुत ही जटिल सॉफ्टवेयर है, जिसे शिकागो मर्केंटाइल एक्सचेंज (CME) ने बनाया था। जिसका अब दुनिया भर के स्टॉक एक्सचेंज इसका इस्तेमाल करते हैं। इसे आसान भाषा में समझें-

  • SPAN मार्जिन आपका 'मुख्य' मार्जिन है। 
  • यह सिर्फ एक ट्रेड को नहीं बल्कि आपके पूरे पोर्टफोलियो (आपके सभी फ्यूचर्स और ऑप्शंस सौदों) को एक साथ देखता है।
  • यह कैलकुलेटर 16 अलग-अलग सिनेरियो (What-if analysis) चलाता है- जैसे: क्या होगा अगर मार्केट 5% गिर जाए?, "क्या होगा अगर वोलैटिलिटी (Volatility) अचानक बढ़ जाए?
  • इन सभी सिनेरियो में से जो सबसे बड़ा संभावित नुकसान (Worst-Case Scenario Loss) होता है। SPAN मार्जिन लगभग उतना ही पैसा आपके ट्रेडिंग अकाउंट से ब्लॉक करता है।

SPAN मार्जिन फिक्स नहीं होता। यह मार्केट की वोलैटिलिटी (अस्थिरता) के आधार पर बदलता रहता है। अगर India VIX (वोलैटिलिटी इंडेक्स) बढ़ता है (जैसे चुनाव या बजट के समय), तो SPAN मार्जिन भी बढ़ा दिया जाता है क्योंकि रिस्क बढ़ जाता है।

2. एक्सपोजर मार्जिन (Exposure Margin)

एक्सपोजर मार्जिन, SPAN MARGIN के ऊपर लगने वाला एक 'अतिरिक्त' या 'एक्स्ट्रा' मार्जिन है क्योंकि 
  • SPAN मार्जिन 'Worst-Case' रिस्क को कवर करता है क्योंकि  कुछ ऐसे रिस्क हो सकते हैं जो SPAN के मॉडल में कवर न हों (जैसे कोई अचानक आई खबर)।
  • एक्सपोजर मार्जिन उसी 'अनदेखे' रिस्क के लिए एक एक्स्ट्रा बफर (Extra Buffer) है।
  • आमतौर पर, यह कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू का एक निश्चित प्रतिशत (जैसे 3% या 5%) होता है।
  • आपका कुल इनिशियल मार्जिन = SPAN मार्जिन + एक्सपोजर मार्जिन 
आपको यह सब खुद कैलकुलेट करने की जरूरत नहीं है। आपका ब्रोकर (Zerodha, Upstox, Angel One, Groww आदि) अपने टर्मिनल पर आपको हर कॉन्ट्रैक्ट के लिए जरूरी 'टोटल मार्जिन' दिखाता है। वे NSE से SPAN फाइलें लेते हैं और आपको रेडीमेड आंकड़ा दे देते हैं।

Futures Margin के फायदे

अब जब आप मार्जिन के एक्सपर्ट बन गए हैं, तो आइए एक नजर डालते हैं कि यह सिस्टम अच्छा है या बुरा। 
Futures margin के निम्नलिखित फायदे हैं -

जबरदस्त लीवरेज (High Leverage): यही मुख्य आकर्षण है। आप 1.5 लाख रुपये से 16 लाख रुपये के एसेट को कंट्रोल कर सकते हैं। छोटे कैपिटल वाले ट्रेडर्स के लिए यह बड़े मुनाफे का दरवाजा खोलता है।

हेजिंग की सुविधा (Hedging Possible): मान लीजिए आपके पास रिलायंस के 5 लाख रुपये के शेयर हैं। आपको डर है कि स्टॉक मार्केट गिर सकता है। आप अपने शेयर्स को बिना बेचे, रिलायंस या Nifty फ्यूचर्स को 'शॉर्ट सेल' (Short Sell) कर सकते हैं। अगर मार्केट गिरा तो आपके शेयर्स में हुआ नुकसान फ्यूचर्स के मुनाफे से कवर हो जाएगा। यह मार्जिन के बिना संभव नहीं होता।

शॉर्ट सेलिंग में आसानी (Easy Short Selling): इक्विटी (कैश मार्केट) में आप शेयर 'शॉर्ट' (यानी पहले बेचना, बाद में खरीदना) सिर्फ इंट्राडे के लिए कर सकते हैं। लेकिन फ्यूचर्स में, आप मार्जिन देकर किसी भी स्टॉक या इंडेक्स को कई दिनों या हफ्तों तक शॉर्ट होल्ड कर सकते हैं। अगर आपको लगता है कि उसकी कीमत गिरेगी।

पूंजी की बचत (Capital Efficiency): आपको 16 लाख रुपये ब्लॉक करने की जरूरत नहीं है। आप 1.5 लाख मार्जिन में खर्च करके बाकी के 9.8 लाख रुपये को कहीं और (जैसे लिक्विड फंड्स या अन्य ट्रेड्स में) इस्तेमाल कर सकते हैं।

Futures Margin नुकसान

असीमित नुकसान का खतरा (Unlimited Loss Potential): यह फ्यूचर्स का सबसे बड़ा खतरा है। जब आप एक ऑप्शन (Option Buy) खरीदते हैं तो आपका अधिकतम नुकसान आपके दिए गए 'प्रीमियम' तक सीमित होता है। लेकिन फ्यूचर्स में आपका नुकसान असीमित हो सकता है। अगर आपने 1.2 लाख का मार्जिन दिया और Nifty आपके खिलाफ 20% गिर गया (मान लीजिए कोई ब्लैक स्वान इवेंट), तो आपका नुकसान 2,20,000 रुपये होगा। ब्रोकर आपसे 1.2 लाख तो लेगा ही, साथ ही अतिरिक्त 1 लाख रुपये भी वसूलेगा। आपका अकाउंट नेगेटिव हो सकता है।

लीवरेज का जाल (The Leverage Trap): ज्यादा लीवरेज का मतलब है ज्यादा रिटर्न का लालच। नए ट्रेडर्स अक्सर अपनी पूरी पूंजी एक ही ट्रेड में लगा देते हैं (Over-leveraging)। एक गलत ट्रेड उनके अकाउंट का 50-70% हिस्सा साफ कर सकता है।

मार्जिन कॉल का तनाव (Stress of Margin Calls): फ्यूचर्स ट्रेडिंग कोई 'लगाओ और भूल जाओ' वाली चीज नहीं है। आपको MTM और अपने मार्जिन लेवल पर रोज नजर रखनी पड़ती है। मार्जिन कॉल का डर एक लगातार बना रहने वाला तनाव है।

वोलैटिलिटी का जोखिम (Volatility Risk): अचानक बाजार में आई तेजी या मंदी (Volatility) आपके मार्जिन की जरूरतों को रातों-रात बढ़ा सकती है, जिससे आप एक सही ट्रेड में होते हुए भी मार्जिन कॉल की वजह से बाहर हो सकते हैं।

 प्रो-टिप्स: Futures Margin को कैसे मैनेज करें?

फ्यूचर्स मार्जिन एक आग की तरह है। आप इससे खाना भी पका सकते हैं और अपना घर भी जला सकते हैं। सफल ट्रेडर बनने की कुंजी इसे 'मैनेज' करने में है।

कभी भी अपना 100% पैसा मार्जिन में न डालें: अगर आपके पास 3 लाख रुपये हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप 1.2 लाख वाले दो लॉट खरीद लें। यह ओवर-लीवरेजिंग है। एक छोटा सा गलत मूव आपको मार्जिन कॉल में फंसा देगा। अतः अपने कुल कैपिटल का 30-40% से ज्यादा मार्जिन में कभी ब्लॉक न करें।

बफर (Buffer) हमेशा रखें: हमेशा अपने ट्रेडिंग अकाउंट में कुछ 'अतिरिक्त' कैश (Extra Cash) रखें। अगर आपने 1.2 लाख का मार्जिन इस्तेमाल किया है, तो कम से कम 50,000 से 1 लाख रुपये का बफर MTM नुकसान को झेलने के लिए अलग से रखें। यह आपको बेवजह की मार्जिन कॉल से बचाएगा।

स्टॉप-लॉस (Stop-Loss) आपका सबसे अच्छा दोस्त है: फ्यूचर्स में बिना स्टॉप-लॉस के ट्रेड करना सुसाइड करने जैसा है। ट्रेड लेने से पहले ही तय कर लें कि आप कितना अधिकतम नुकसान उठाने को तैयार हैं। जैसे ही Nifty उस लेवल पर पहुंचे, सिस्टम को अपना ट्रेड काटकर नुकसान बुक करने दें। यह आपको असीमित नुकसान से बचाता है।

मार्जिन के बदले कैश (Cash) को प्राथमिकता दें: कई ब्रोकर आपको मार्जिन के बदले आपके शेयर्स या म्यूच्यूअल फंड्स को 'गिरवी' (Pledge) रखने की सुविधा देते हैं। यह अच्छा है, लेकिन एक नियम याद रखें: कम से कम 50% मार्जिन हमेशा 'कैश' या 'कैश इक्विवेलेंट' (जैसे लिक्विड फंड्स) में होना चाहिए। MTM नुकसान हमेशा कैश से ही सेटल होता है।

ब्रोकर का मार्जिन कैलकुलेटर इस्तेमाल करें: कोई भी ट्रेड लेने से पहले, अपने ब्रोकर के 'मार्जिन कैलकुलेटर' (Margin Calculator) का इस्तेमाल करके यह चेक करें कि उस ट्रेड के लिए कितने मार्जिन की जरूरत होगी।

निष्कर्ष: मार्जिन एक टूल है, लॉटरी का टिकट नहीं तो फ्यूचर्स मार्जिन क्या है? संक्षेप में, यह एक 'सिक्योरिटी डिपॉजिट' है जो आपको लीवरेज की दुनिया में कदम रखने देता है। यह वह चाबी है जो 1.2 लाख रुपये से 11 लाख रुपये के ट्रेड का ताला खोलती है।

यह आपको कम पूंजी में बड़ा मुनाफा कमाने का मौका देता है, लेकिन साथ ही यह आपको बड़े नुकसान के भंवर में भी धकेल सकता है। फ्यूचर्स ट्रेडिंग में सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप कितना सही होते हैं। यह इस बात पर निर्भर करती है कि जब आप गलत होते हैं तो आप कितना कम खोते हैं।

यह सब 'मार्जिन मैनेजमेंट' और 'रिस्क मैनेजमेंट' से शुरू होता है। फ्यूचर्स मार्जिन को एक जिम्मेदारी समझें, न कि एक विशेषाधिकार। इसका सम्मान करें, इसे समझें और इसे समझदारी से इस्तेमाल करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs):

Q1: क्या फ्यूचर्स मार्जिन पर ब्याज (Interest) लगता है? 

A1: नहीं। फ्यूचर्स मार्जिन आपका अपना पैसा है जो सिर्फ 'ब्लॉक' किया गया है, यह कोई लोन नहीं है। इसलिए इस पर कोई ब्याज नहीं लगता। (हालांकि, अगर आपका MTM लॉस होता है और आपका बैलेंस नेगेटिव हो जाता है, तो ब्रोकर उस नेगेटिव बैलेंस पर ब्याज लगा सकता है)।

Q2: फ्यूचर्स मार्जिन और इक्विटी इंट्राडे मार्जिन में क्या अंतर है?

B2: फ्यूचर्स मार्जिन (F&O Margin): यह एक्सचेंज (NSE) द्वारा तय किया जाता है और यह आपको अपनी पोजीशन को 'ओवरनाइट' (अगले दिन या एक्सपायरी तक) ले जाने की अनुमति देता है। यह SPAN + एक्सपोजर पर आधारित होता है। इक्विटी इंट्राडे मार्जिन: यह ब्रोकर द्वारा (जैसे 5x, 10x) दिया जाता है और यह सिर्फ 'इंट्राडे' (उसी दिन 3:20 PM तक) के लिए मान्य होता है। आपको अपनी पोजीशन उसी दिन काटनी पड़ती है, चाहे फायदा हो या नुकसान।

Q3: क्या मैं मार्जिन के बदले अपने शेयर्स गिरवी (Pledge) रख सकता हूँ? 

A3: हाँ, बिलकुल। अधिकांश ब्रोकर आपको अपनी डीमैट होल्डिंग्स (शेयर्स, ETFs, म्यूच्यूअल फंड्स) को गिरवी (Pledge) करके मार्जिन प्राप्त करने की सुविधा देते हैं। हालांकि, MTM नुकसान को कवर करने के लिए आपके पास कैश बैलेंस होना जरूरी है।

Q4: Nifty फ्यूचर्स और Bank Nifty फ्यूचर्स का मार्जिन अलग-लग क्यों होता है? 

A4: मार्जिन (SPAN) सीधे तौर पर 'वोलैटिलिटी' (अस्थिरता) पर निर्भर करता है। Bank Nifty आमतौर पर Nifty से ज्यादा वोलेटाइल (अस्थिर) होता है, इसलिए उसका रिस्क ज्यादा होता है। ज्यादा रिस्क का मतलब है ज्यादा 'सिक्योरिटी डिपॉजिट', यानी ज्यादा मार्जिन।

Q5: अगर मैं मार्जिन कॉल का पैसा नहीं दे पाया तो क्या होगा? 

A5: ब्रोकर आपकी पोजीशन को खुद ही बाजार में बेच (Square Off) देगा, चाहे आपको कितना भी नुकसान हो रहा हो। अगर नुकसान आपके मार्जिन से ज्यादा है, तो ब्रोकर वह पैसा आपके ट्रेडिंग अकाउंट के बैलेंस से काटेगा, और अगर वह भी कम पड़ा, तो वह आपसे कानूनी तौर पर पैसे की वसूली करेगा। 

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