प्रोटेक्टिव पुट स्ट्रेटेजी क्या है?
Protective Put Strategy उन इन्वेस्टर्स के लिए एक बहुमुखी रिस्क-मैनेजमेंट स्ट्रेटेजी है जो अपने इन्वेस्टमेंट को संभावित स्टॉक या एसेट के नुकसान से बचाना चाहते हैं। पुट ऑप्शन खरीदकर, इन्वेस्टर्स गिरावट से बचाव कर सकते हैं, साथ ही ऊपर की ओर मूवमेंट से प्रॉफिट कमाने की संभावना भी बनाए रख सकते हैं। जिससे यह एक इन्वेस्टर के पोर्टफोलियो में एक ज़रूरी टूल बन जाता है।
Protective Put Strategy स्ट्रेटेजी लॉन्ग-पोजीशन में संभावित नुकसान से आपको बचा सकती है। अगर आपने कोई स्टॉक खरीदा है और आप मार्केट में गिरावट की चिंता कर रहे हैं, तो यह हैजिंग स्ट्रेटेजी आपकी ढाल बन सकती है। Protective Put एक ऐसा ऑप्शन ट्रेडिंग स्ट्रैटेजी है, जिसमें निवेशक किसी स्टॉक को खरीदता है और साथ ही उस स्टॉक पर एक Put Option भी खरीदता है। इसका उद्देश्य संभावित नुकसान को सीमित करना और प्रॉफिट को बनाये रखना होता है।
पुट अपने आप में एक बेयरिश स्ट्रेटेजी है, जिसमें ट्रेडर्स का मानना होता है कि शेयर के प्राइस भविष्य में गिर जायेंगे। हालाँकि एक प्रोटेक्टिव पुट का उपयोग आमतौर पर तब किया जाता है। तब इन्वेस्टर्स ने लॉन्ग पोजीशन बनाई होती है। तब संभावित नुकसान से बचने के लिए यह हैजिंग पोजीशन बनाई जाती है।
मान लीजिए आपने 1000 रूपये प्रति शेयर के हिसाब से रिलायंस इंडस्ट्रीज के 100 शेयर खरीदे। अब आपको डर है कि स्टॉक गिर सकता है, इसलिए आप 950 रूपये की स्ट्राइक प्राइस वाला Put Option खरीद लेते हैं। अगर स्टॉक 800 रूपये पर गिर जाता है, तो आप Put Option का प्रयोग करके इसे 950 रूपये पर बेच सकते हैं। इस तरह आप अपने नुकसान सीमित कर सकते हैं।
Protective Put को आप कमोडिटी, स्टॉक, क्रिप्टोकोर्रेंसी की ट्रेडिंग में उपयोग कर सकते हैं। प्रोटेक्टिव पुट खरीदार के लिए असीमित प्रॉफिट की संभावनाएं पैदा करती है क्योंकि खरीदार अंडरलाइंग एसेट का मालिक होता है। प्रोटेक्टिव पुट अंडरलाइंग एसेट की सम्पूर्ण पोजीशन कवर करता है इसलिए इसे मैरिड पुट भी कहा जाता है।
प्रोटेक्टिव पुट कैसे काम करता है
Protective Put Strategy का इस्तेमाल खासतौर पर तब किया जाता है। जब कोई इन्वेस्टर लॉन्ग होता है या स्टॉक या दूसरी एसेट्स के शेयर खरीदता है। जिन्हें वह अपने पोर्टफोलियो में रखना चाहता है। जिस इन्वेस्टर के पास स्टॉक होता है और स्टॉक का प्राइस खरीद प्राइस से नीचे गिर जाता है। तब इन्वेस्टर इन्वेस्टमेंट पर नुकसान होने का रिस्क होता है। पुट ऑप्शन खरीदने से स्टॉक में होने वाले संभावित नुकसान सीमित हो जाते हैं।
प्रोटेक्टिव पुट एक फ्लोर प्राइस बनाता है, जिससे एसेट की कीमत गिरने पर और अधिक नुकसान होने से रोका जा सकता है। जब किसी शेयर को खरीदा जाता है, यानि उसमे लॉन्ग पोजीशन बनाई जाती है। प्रोटेक्टिव पुट स्ट्रेटेजी बनाने के लिए उसी स्टॉक पर एक Put Option खरीदा जाता है। यदि स्टॉक की कीमत गिरती है, तो Put Option सुरक्षा प्रदान करता है।
पुट ऑप्शन एक कॉन्ट्रैक्ट है जो मालिक को एक तय तारीख से पहले या उस तारीख तक अंडरलाइंग सिक्योरिटी की एक खास मात्रा को एक तय कीमत पर बेचने की क्षमता देता है। फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के उलट, ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट होल्डर को एसेट बेचने के लिए मजबूर नहीं करता है।
उन्हें तभी बेचने की इजाज़त देता है, जब वे ऐसा करना चाहें। कॉन्ट्रैक्ट की तय कीमत को स्ट्राइक प्राइस कहा जाता है, और तय तारीख एक्सपायरी डेट या एक्सपायरी होती है। एक ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट का लॉट साइज़ अंडरलाइंग एसेट के बहुत सारे शेयरों (100 - 200 या इससे भी ज्यादा) के बराबर होता है।
ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट पर लगने वाली फीस को प्रीमियम कहा जाता है। इस कीमत का आधार कई फैक्टर्स पर होता है, जिसमें अंडरलाइंग एसेट की मौजूदा कीमत, एक्सपायरी तक का समय, और एसेट की इम्प्लाइड वोलैटिलिटी (IV) शामिल है - यानी कीमत में कितना बदलाव होने की संभावना है।
स्टॉक ऑप्शन का प्रीमियम स्ट्राइक प्राइस से तय होता है। इसके प्राइस को कई फेक्टर्स प्रभावित करते हैं जैसे "थीटा" यानि टाइम डिके, ऑप्शन की एक्सपायरी डेट जितना नजदीक होती है, पुट और कॉल ऑप्शन का प्रीमियम उतना ही कम होता है। इसी तरह ऑप्शन की एक्सपायरी जितना अधिक दूर होती है। ऑप्शन प्रीमियम उतना ही ज्यादा होता है।
अगर मार्केट में वोलैटिलिटी बहुत अधिक है तो सभी ऑप्शंस के प्रीमियम बहुत अधिक बढ़ जाते हैं। जब 2924 में भारत के आम चुनावों (लोकसभा) का रिजल्ट आया था तब ऑप्शंस के प्रीमियम बहुत ज्यादा बढ़ गए थे। मेरे कहने का मतलब है कि पुट ऑप्शन खरीदना इतना भी फायदे का सौदा नहीं हैं क्योंकि एक्सपायरी के बाद इनकी वैल्यू जीरो हो जाती है।
यदि स्टॉक की कीमत बढ़ती है, तो इन्वेस्टर को प्रॉफिट मिलता है, लेकिन Put Option की लागत यानि प्रीमियम चुकाना पड़ता है। यदि आपको लगता है कि किसी शेयर का प्राइस लॉन्ग-टर्म में तो ऊपर जायेगा लेकिन शार्ट-टर्म में उसके प्राइस में गिरावट आ सकती है। जैसे कि किसी न्यूज की वजह से प्राइस गिरावट आना आदि। अगर आपने उस शेयर मे भारी इन्वेस्टमेंट कर रखा है और आप जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं तो आप इस दौरान उस शेयर पुट ऑप्शन खरीद सकते हैं।
प्रोटेक्टिव पुट स्ट्रेटेजी के फायदे और नुकसान
- सीमित नुकसान: यह स्ट्रेटेजी आपको एक प्रीमियम देकर स्टॉक के प्राइस गिरने पर उसे न्यूनतम प्राइस पर खरीदने का अधिकार देती है। इस प्रकार आप अपने नुकसान को एक निश्चित सीमा तक कम कर सकते हैं।
- असीमित प्रॉफिट की संभावना: यदि स्टॉक की कीमत ऊपर जाती है। तब Put Option का कोई उपयोग नहीं होगा, लेकिन आपके स्टॉक का प्राइस बढ़ेगा और आप प्रॉफिट में रहेंगे।
- मानसिक शांति: स्टॉक मार्केट वोलैटिलिटी के बावजूद आप निश्चिंत रह सकते हैं कि आपका नुकसान सीमित रहेगा।
- लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट का सपोर्ट: Protective Put रणनीति लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए बेहतरीन होती है जो किसी स्टॉक को वर्षों तक होल्ड करना चाहते हैं।
- प्रोटेक्टिव पुट ऑप्शन स्ट्रेटेजी: यह स्टॉक इन्वेस्टमेंट के डाउनसाइड रिस्क को सीमित करने के लिए एक तरह के इंश्योरेंस का काम करती है। इस डाउनसाइड सुरक्षा की लागत पुट ऑप्शन के लिए दिया गया प्रीमियम है, जो कुल मुनाफे को कम कर सकता है।
- प्रीमियम का खर्च: हर बार जब आप Put Option खरीदते हैं, तो आपको प्रीमियम देना पड़ता है। यदि स्टॉक गिरता नहीं है, तो यह पैसा फिजूल ही खर्च हो जाता है।
- जटिलता: Beginners ट्रेडर्स के लिए Protective Put समझना और सही तरीके से लागू करना थोड़ा कठिन हो सकता है।
- बार-बार Renew करना: यदि आप एक लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर हैं, तो आपको समय-समय पर नया Put Option खरीदना होगा। जिससे लागत बढ़ा सकता है और प्रॉफिट कम हो सकता है।

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