Bid-ask spread: क्या आपने कभी गौर किया है कि जैसे ही आप कोई शेयर खरीदते हैं, वह तुरंत 'लॉस' में क्यों दिखाने लगता है? बिना कीमत गिरे ही आपका पैसा कटना शुरू हो जाता है—यह कोई टेक्निकल ग्लिच नहीं, बल्कि Bid-Ask Spread का खेल है। अगर आप एक बिगिनर हैं, तो यह छोटा सा अंतर आपके साल भर के मुनाफे को 20% तक कम कर सकता है। इस लेख में हम इस 'गुप्त टैक्स' का पर्दाफाश करेंगे ताकि आप हर ट्रेड पर पैसे बचा सकें और स्मार्ट इन्वेस्टर बन सकें। आइए जानते हैं- शेयर मार्केट का 'हिडन चार्ज': क्या आप भी Bid-Ask Spread में पैसा गंवा रहे हैं?
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| शेयर मार्केट में ट्रेडिंग कॉस्ट का कैलकुलेशन (Bid-Ask Spread)। |
Bid-ask spread क्या है?
बिड-आस्क स्प्रेड क्या है? शेयर बाजार में हर समय दो कीमतें चल रही होती हैं-
- बिड (Bid): वह अधिकतम कीमत जो एक खरीददार (Buyer) देने को तैयार है।
- आस्क (Ask): वह न्यूनतम कीमत जो एक विक्रेता (Seller) स्वीकार करने को तैयार है।
- स्प्रेड (Spread): इन दोनों कीमतों के बीच के अंतर को 'बिड-आस्क स्प्रेड' कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, अगर Reliance के शेयर के लिए खरीदार ₹2500 (Bid) देने को तैयार है और बेचने वाला ₹2505 (Ask) मांग रहा है, तो स्प्रेड ₹5 होगा।
शेयर मार्केट में, बिड-आस्क स्प्रेड किसी शेयर की मांग प्राइस और बोली प्राइस के बीच का अंतर होता है। Bid-ask spread उस प्राइस के बीच का अंतर है। जिसे एक खरीदार किसी शेयर के लिए भुगतान करने को तैयार होता है। सेलर जिस प्राइस पर अपने शेयर बेचने के लिए तैयार होता है उसे ही स्प्रेड लेनदेन की लागत को कहते हैं।
बिड-आस्क स्प्रेड टर्म का सही उपयोग शेयर मार्केट ट्रेडर्स और इन्वेस्टर्स के लिए जरूरी है। लेकिन बहुत से लोग यह नहीं जानते होंगे कि इसका क्या मतलब है? यह शेयर बाजार से कैसे संबंधित है? Bid-ask spread उस प्राइस को प्रभावित कर सकता है, जिस पर शेयरों खरीदारी और बिक्री की जाती है। इस प्रकार इससे शेयर मार्केट ट्रेडर्स और इन्वेस्टर्स के सम्पूर्ण पोर्टफोलियो के रिटर्न प्रभावित हो सकते हैं।
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बिड-आस्क स्प्रेड काफी हद तक शेयर की लिक्विडिटी (ट्रेडिंग वॉल्यूम) पर निर्भर करता है। Stock जितना अधिक लिक्विड होगा, स्प्रेड उतना ही टाइट होगा। जब कोई ऑर्डर दिया जाता है, तब बायर और सेलर का दायित्व होता है कि वे सहमत कीमत पर अपने शेयर खरीदें और बेचें।
शेयर मार्केट ट्रेडर्स और इन्वेस्टर्स को spread के बारे में जानने से पहले डिमांड एंड सप्लाई की अवधारणा को समझना चाहिए। डिमांड से तात्पर्य किसी वस्तु या स्टॉक के लिए किसी व्यक्ति द्वारा विशेष प्राइस चुकाने की इच्छा व्यक्त करना। सप्लाई का तात्पर्य बाज़ार में किसी विशेष वस्तु की मात्रा या प्रचुरता से है। जैसे बिक्री के लिए स्टॉक की सप्लाई करना।
Stock की लिक्विडिटी का संबंध उसके Bid-ask spread से हो है। जिस शेयर में ट्रेडिंग बहुत ज्यादा होती है (जैसे Nifty 50 के शेयर्स), वहां स्प्रेड बहुत कम होता है। वहीं 'Penny Stocks' में यह अंतर बहुत ज्यादा हो सकता है। इंट्राडे ट्रेडर्स के लिए छोटा स्प्रेड अच्छा होता है क्योंकि इससे उनकी एंट्री और एग्जिट कॉस्ट कम हो जाती है।
अतः Bid-ask spread उन स्तरों का संकेत देता है जहां बायर खरीदेंगे और सेलर बेचेंगे। एक टाइट Bid-ask spread अच्छी लिक्विडिटी के साथ एक्टिवली ट्रेड किये जाने वाले stock का संकेत दे सकता है। एक वाइड बिड -आस्क स्प्रेड टाइट बिड-आस्क स्प्रेड के बिल्कुल विपरीत संकेत दे सकता है।
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जिस शेयर में डिमांड और सप्लाई में असंतुलन होता है और लिक्विडिटी कम होती है। इसे कम ट्रेडिंग वॉल्यूम के रूप में भी समझ सकते हैं। इससे Bis-ask spread काफी हद तक बढ़ जाता है। मार्केट में लोकप्रिय शेयरों ( टीसीएस, एचसीएल, एचडीएफसी आदि ) का बिस -आस्क स्प्रेड टाइट होता है। इसके विपरीत जिन शेयरों में कम ट्रेडिंग वॉल्यूम होता है। उनमें बिड-आस्क स्प्रेड वाइड होता है। बिड-आस्क स्प्रेड को मार्केट डेप्थ भी कहा जाता है।
किसी स्टॉक की लिक्विडिटीआमतौर पर यह दर्शाती है कि इस स्टॉक की कीमत को प्रभावित किए बिना तेजी से खरीदा या बेचा जा सकता है। कम लिक्विडिटी वाले स्टॉक को खरीदना मुश्किल हो सकता है और आप जब चाहें उसे शेयर नहीं बेच सकते हैं। इससे आपको बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। किसी विशेष stock के लिए बिड प्राइस और आस्क प्राइस के बीच का अंतर ही स्प्रेड कहलाता है।
Bid-ask spread एक उदाहरण के द्वारा समझते हैं, मान लें कि NTPC का शेयर 100 रूपये के भाव पर ट्रेड कर रहा है। XYZ ट्रेडर NTPC के 200 शेयर 360 रूपये के भाव पर प्रति शेयर खरीदना चाहता है। और रमेश नाम का इन्वेस्टर 361.25 रूपये के भाव पर 200 शेयर बेचना चाहता है।
इसमें स्प्रेड 360 रूपये प्रति शेयर की मांग (Bid) कीमत और 361.25 रूपये की बोली (ask) कीमत के बीच का अंतर है। यानि इस इस बिड-आस्क में 1 रूपये 25 पैसे यानि 1.25 का स्प्रेड है। स्टॉक के स्प्रेड का साइज, सप्लाई एंड डिमांड से निर्धारित होती है। जितने अधिक रिटेल ट्रेडर्स और इन्वेस्टर्स या कंपनियाँ शेयर खरीदना और बेचना चाहेंगे। उतनी अधिक bids होंगी और उसके परिणामस्वरूप अधिक ऑफ़र और माँगें होंगी।
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स्प्रेड (Spread) क्यों होता है?
शेयर बाजार में कोई भी मुफ्त में काम नहीं करता। स्प्रेड होने के निम्नलिखित मुख्य तीन कारण हैं-
- लिक्विडिटी (Liquidity): जिस शेयर में बहुत ज्यादा लोग खरीद-फरोख्त कर रहे हैं (जैसे Reliance या TCS), वहां स्प्रेड बहुत कम होता है। कम ट्रेडिंग वाले शेयर्स में स्प्रेड बहुत ज्यादा हो सकता है।
- मार्केट वॉल्यूम: अगर किसी शेयर का वॉल्यूम कम है, तो मार्केट मेकर (Market Makers) को जोखिम ज्यादा होता है, इसलिए वे स्प्रेड बढ़ा देते हैं।
- अस्थिरता (Volatility): जब बाजार में भारी उतार-चढ़ाव होता है, तो खरीदार और विक्रेता सुरक्षित रहने के लिए अपनी कीमतों में बड़ा अंतर रखते हैं।
Bid-Ask Spread का मिलान कैसे किया जाता है? स्टॉक एक्सचेंजों पर, एक बयार और सेलर का मिलान कंप्यूटर द्वारा किया जाता है। हालाँकि, कुछ मामलों में, एक विशेषज्ञ जो संबंधित स्टॉक को संभालता होता है। वह एक्सचेंज फ्लोर पर बायर और सेलर का मिलान करते हैं।
buyers और sellers की अनुपस्थिति में, यह व्यक्ति Stock market को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए स्टॉक के लिए bid-ask प्राइस को पोस्ट करेते है। भारत के मुख्य स्टॉक एक्सचेंज BSE और NSE पर, मार्केट मेकर bid-ask पोस्ट करने के लिए एक कंप्यूटर सिस्टम का उपयोग करेते हैं। जो अनिवार्य रूप से एक मार्केट विशेषज्ञ के रूप में भूमिका निभाते हैं। हालाँकि, ये कोई फिजीकल फ्लोर नहीं है। सभी ऑर्डर इलेक्ट्रॉनिक रूप से चिह्नित होते हैं।
Stock market ऑर्डर के प्रकार
ट्रेडर्स और इन्वेस्टर्स शेयर मार्केट में शेयर खरीदने और बेचने के लिए निम्नलिखित प्रकार के ऑर्डर दे कर सकते हैं।
1. मार्केट ऑर्डर: मार्केट ऑर्डर बाजार या प्रचलित कीमत पर भरा जा सकता है। ऊपर दिए गए उदाहरण का उपयोग करके, यदि खरीदार को टाटा स्टील के 200 शेयर खरीदने का ऑर्डर देना था तो खरीदार को 195.25 रूपये की मांगी गई कीमत पर 200 शेयर प्राप्त होंगे। यदि वे 500 शेयरों के लिए मार्केट ऑर्डर देते हैं तो खरीदार को 196.25 पर 200 शेयर और अगले सर्वोत्तम प्रस्ताव प्राइस पर 300 शेयर मिलेंगे। जो 196.25 से अधिक भी हो सकता है।
2. लिमिट ऑर्डर: एक ट्रेडर किसी निश्चित प्राइस या मार्केट प्राइस से बेहतर प्राइस पर एक निश्चित मात्रा में शेयर बेचना या खरीदना चाहता है तो वह लिमिट ऑर्डर देता है। जिसमे वह अपने पसंद के प्राइस को भरता है। उपरोक्त स्प्रेड उदाहरण का उपयोग करते हुए, एक ट्रेडर 196.25 पर 500
शेयर बेचने के लिए एक लिमिट ऑर्डर दे सकता है।
ऐसा ऑर्डर देने पर, ट्रेडर 196.25 की मौजूदा पेशकश पर तुरंत 200 शेयर बेच देगा। किन्तु 300 शेयरों के लिए फिर, उन्हें तब तक इंतजार करना पड़ सकता है जब तक कोई दूसरा खरीदार न आ जाए और ऑर्डर की शेष राशि भरने के लिए 196.25 या इससे बेहतर की बोली न लगा दे फिर, स्टॉक का शेष तब तक नहीं बेचा जाएगा जब तक कि शेयर 196. 25 रूपये या उससे अधिक पर कारोबार न करें।
यदि स्टॉक प्राइस 196.25 रूपये प्रति शेयर से नीचे रहता है तो सेलर कभी भी स्टॉक को बेचने में सक्षम नहीं हो सकता है। लिमिट ऑर्डर का उपयोग करने वाले इन्वेस्टर्स और ट्रेडर्स को मुख्य बात यह ध्यान में रखनी चाहिए। यदि वे शेयर खरीदने की कोशिश कर रहे हैं तो ऑर्डर के लिए आस्क प्राइस, न केवल बिड प्राइस, बल्कि उनकी लिमिट ऑर्डर प्राइस के स्तर या उससे नीचे शेयर का प्राइस गिरना चाहिए, तभी उनका ऑर्डर पूरा हो सकता है।
स्टॉप ऑर्डर: जब स्टॉक का प्राइस एक निश्चित स्तर से गुजरता है तो
स्टॉप ऑर्डर काम करता है। स्टॉप ऑर्डर एक स्टॉक खरीदने या बेचने का ऑर्डर है। जब स्टॉक की कीमत एक निर्दिष्ट मूल्य तक पहुंच जाती है, जिसे स्टॉप प्राइस के रूप में जाना जाता है। जब शेयर का प्राइस निर्दिष्ट मूल्य पर पहुँच जाता है तो आपका स्टॉप ऑर्डर मार्केट ऑर्डर बन जाता है।
Bid-ask spread अनिवार्य रूप से प्रगतिशील बातचीत है। Share market में सफल होने के लिए, ट्रेडर्स को एक स्टैंड लेने और लिमिट ऑर्डर के माध्यम से Bid-ask की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए तैयार रहना चाहिए। बिड-आस्क की चिंता किए बिना और किसी लिमिट प्राइस पर जोर दिए बिना मार्केट ऑर्डर निष्पादित करके, ट्रेडर्स अनिवार्य रूप से किसी अन्य ट्रेडर की बोली की पुष्टि कर रहे होते हैं। जिससे उस ट्रेडर के लिए रिटर्न तैयार हो रहा है।
स्प्रेड आपके प्रॉफिट को कैसे प्रभावित करता है?
एक आम ट्रेडर अक्सर इसे नजरअंदाज कर देता है, लेकिन एक इंट्राडे ट्रेडर के लिए यह 'करो या मरो' की स्थिति है।
आपने 1000 शेयर खरीदे जिसका स्प्रेड ₹0.50 था। जैसे ही आपने ट्रेड लिया, आप ₹500 के 'काल्पनिक घाटे' में आ गए। अब मुनाफा कमाने के लिए शेयर को कम से कम ₹0.51 ऊपर जाना होगा।
अतः हमेशा Limit Order का इस्तेमाल करना चाहिए। मार्केट ऑर्डर आपको 'Ask Price' (महंगी कीमत) पर शेयर दिलाता है। जबकि लिमिट ऑर्डर से आप अपनी पसंद की 'Bid Price' पर शेयर खरीद सकते हैं।
लिक्विडिटी और स्प्रेड का गहरा रिश्ता: High Liquidity (Narrow Spread) जैसे निफ्टी 50 के स्टॉक्स। इन स्टॉक्स में स्प्रेड कुछ पैसों का होता है। अतः यहाँ ट्रेड करना सुरक्षित और सस्ता होता है। Low Liquidity (Wide Spread) जैसे
पेनी स्टॉक्स (Penny Stocks)। यहाँ स्प्रेड ₹1 से ₹5 तक हो सकता है। यहाँ घुसना आसान है, पर निकलना बहुत महंगा पड़ता है।
बिड-आस्क स्प्रेड को कम करने के उपाय: यदि आप अपना ट्रेडिंग प्रॉफिट बढ़ाना चाहते हैं, तो निम्नलिखित नियमों का पालन करें-
- मार्केट ऑर्डर्स से बचें: हमेशा 'Limit Order' लगाएं। इससे आप स्प्रेड का शिकार होने से बचेंगे।
- ट्रेडिंग का समय: मार्केट खुलने के शुरुआती 15 मिनट और बंद होने के आखिरी 15 मिनट में स्प्रेड सबसे ज्यादा होता है। बीच के समय में ट्रेड करना सस्ता पड़ता है।
- हाई वॉल्यूम स्टॉक्स चुनें: केवल उन्हीं स्टॉक्स में ट्रेड करें जिनका औसत डेली वॉल्यूम लाखों में हो।
- मार्जिन कैलकुलेटर का प्रयोग करें: ब्रोकरेज के साथ-साथ स्प्रेड को भी अपनी लागत में जोड़ें।
FAQs : आपके मन के उलझे सवाल
प्रश्न 1: क्या बिड-आस्क स्प्रेड ब्रोकर की कमाई है?
उत्तर: नहीं, यह बाजार की तरलता (Liquidity) पर निर्भर करता है। हालांकि, कुछ मामलों में मार्केट मेकर्स इससे मुनाफा कमाते हैं, लेकिन आपका ब्रोकर आपसे अलग से ब्रोकरेज लेता है।
प्रश्न 2: सबसे कम स्प्रेड कहाँ मिलता है?
उत्तर: इंडेक्स फंड्स, ईटीएफ (ETFs) और लार्ज-कैप स्टॉक्स में सबसे कम स्प्रेड मिलता है।
प्रश्न 3: क्या स्प्रेड कभी जीरो हो सकता है?
उत्तर: सैद्धांतिक रूप से बहुत मुश्किल है, क्योंकि खरीदार और विक्रेता के बीच हमेशा कुछ न कुछ असहमति होती है, लेकिन बहुत लिक्विड स्टॉक्स में यह ₹0.05 (न्यूनतम टिक साइज) तक हो सकता है।
प्रश्न 4: बिड-आस्क स्प्रेड आपको क्या बताता है?
उत्तर: वित्तीय बाजारों में, Bid-ask spread किसी शेयर या अन्य एसेट की बिड प्राइस और आस्क प्राइस के बीच का अंतर होता है। Bid-ask spread एक खरीदार द्वारा दी जाने वाली उच्चतम कीमत (बोली मूल्य) और विक्रेता द्वारा स्वीकार की जाने वाली सबसे कम कीमत (पूछने की कीमत) के बीच का अंतर होता है।
प्रश्न 5: क्या हाई Bid-ask spread अच्छा है?
उत्तर: टाइट स्प्रेड शेयर में अधिक लिक्विडिटी का संकेत होता है। जबकि वाइड बिड-आस्क स्प्रेड कम लिक्विड या हाई वोलेटाइल शेयरों में होते हैं। जब बिड-आस्क का दायरा व्यापक होता है। तो उचित प्राइस पर किसी शेयर को खरीदनाऔर बेचना अधिक कठिन हो सकता है।
प्रश्न 6: क्या आप बिड प्राइस पर खरीदते हैं या आस्क प्राइस पर?
उत्तर: आस्क प्राइस वह न्यूनतम कीमत है, जिसे शेयर बेचने वाला स्वीकार करता है। bid-ask कीमतों के बीच के अंतर को ही स्प्रेड कहा जाता है। स्प्रेड जितना अधिक होगा, शेयर में लिक्विडिटी उतनी ही कम होगी। कोई ट्रेड तभी होगा जब कोई ट्रेडर बिड प्राइस पर शेयर बेचने या मांगी गई कीमत पर खरीदने को तैयार होगा।
प्रश्न 7: क्या कम बिड-आस्क स्प्रेड अच्छा है?
उत्तर: अक्सर, एक कम स्प्रेड हाई लिक्विडिटी का संकेत देता है। जिसका अर्थ है कि मार्केट में अधिक बयार और सेलर किसी पर्टिकुलर शेयर को खरीदने और बेचने के इच्छुक हैं। इसके विपरीत वाइड स्प्रेड लिक्विडिटी का संकेत देता है। जिस शेयर को खरीदने और बेचने के कम लोग इच्छुक होते हैं। उसमे वाइड स्प्रेड होता है।
निष्कर्ष: समझदारी ही असली कमाई है, बिड-आस्क स्प्रेड को समझना केवल एक थ्योरी नहीं है, बल्कि यह आपके पैसे बचाने का टूल है। एक सफल ट्रेडर वह नहीं है जो सिर्फ सही शेयर चुनता है, बल्कि वह है जो सही कीमत पर एंट्री और एग्जिट करना जानता है। अगली बार जब आप 'Buy' बटन दबाएं, तो एक बार 'Bid' और 'Ask' के गैप को जरूर देख लें।
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